Wednesday, April 6, 2011

आग की भीख - रामधारी सिंह दिनकर

धुँधली हुई दिशाएँ, छाने लगा कुहासा
कुचली हुई शिखा से आने लगा धुआँसा
कोई मुझे बता दे, क्या आज हो रहा है
मुंह को छिपा तिमिर में क्यों तेज सो रहा है
दाता पुकार मेरी, संदीप्ति को जिला दे
बुझती हुई शिखा को संजीवनी पिला दे
प्यारे स्वदेश के हित अँगार माँगता हूँ
चढ़ती जवानियों का श्रृंगार मांगता हूँ

बेचैन हैं हवाएँ, सब ओर बेकली है
कोई नहीं बताता, किश्ती किधर चली है
मँझदार है, भँवर है या पास है किनारा?
यह नाश आ रहा है या सौभाग्य का सितारा?
आकाश पर अनल से लिख दे अदृष्ट मेरा
भगवान, इस तरी को भरमा न दे अँधेरा
तमवेधिनी किरण का संधान माँगता हूँ
ध्रुव की कठिन घड़ी में, पहचान माँगता हूँ

आगे पहाड़ को पा धारा रुकी हुई है
बलपुंज केसरी की ग्रीवा झुकी हुई है
अग्निस्फुलिंग रज का, बुझ डेर हो रहा है
है रो रही जवानी, अँधेर हो रहा है
निर्वाक है हिमालय, गंगा डरी हुई है
निस्तब्धता निशा की दिन में भरी हुई है
पंचास्यनाद भीषण, विकराल माँगता हूँ
जड़ताविनाश को फिर भूचाल माँगता हूँ

मन की बंधी उमंगें असहाय जल रही है
अरमान आरजू की लाशें निकल रही हैं
भीगी खुशी पलों में रातें गुज़ारते हैं
सोती वसुन्धरा जब तुझको पुकारते हैं
इनके लिये कहीं से निर्भीक तेज ला दे
पिघले हुए अनल का इनको अमृत पिला दे
उन्माद, बेकली का उत्थान माँगता हूँ
विस्फोट माँगता हूँ, तूफान माँगता हूँ

आँसू भरे दृगों में चिनगारियाँ सजा दे
मेरे शमशान में आ श्रंगी जरा बजा दे
फिर एक तीर सीनों के आरपार कर दे
हिमशीत प्राण में फिर अंगार स्वच्छ भर दे
आमर्ष को जगाने वाली शिखा नयी दे
अनुभूतियाँ हृदय में दाता, अनलमयी दे
विष का सदा लहू में संचार माँगता हूँ
बेचैन जिन्दगी का मैं प्यार माँगता हूँ

ठहरी हुई तरी को ठोकर लगा चला दे
जो राह हो हमारी उसपर दिया जला दे
गति में प्रभंजनों का आवेग फिर सबल दे
इस जाँच की घड़ी में निष्ठा कड़ी, अचल दे
हम दे चुके लहु हैं, तू देवता विभा दे
अपने अनलविशिख से आकाश जगमगा दे
प्यारे स्वदेश के हित वरदान माँगता हूँ
तेरी दया विपद् में भगवान माँगता हूँ

Not mine thought

गद-हा = गद + हा = रोग + हरना = रोग को हरने वाला = डाक्टर बाबू
Every donkey will be happy now(if they weren't already by assiduous)!!

Wednesday, January 12, 2011

A reminder for us, towards our duties

A famous poem by rashtra kavi Ramdhari Singh Dinkar reminding us of our duties towards society.

 क्यों ये आग बुझाओगे?
रेशमी कलम से भाग्यलेख लिखने वालों
तुम भी कभी अभावग्रस्त हो रोये हो ?
बीमार किसी बच्चे की दवा जुटाने को
तुम भी क्या घर पर पेट बाँध कर सोये हो ?

असहाय किसानों की किस्मत को खेतों में
अनायास जल में बह जाते देखा है ?
क्या खायेंगे? ये सोच निराशा से पागल
बेचारों को चीख रह जाते देखा है?

देखा है ग्रामों की अनेक रम्भाओं को
जिनकी अभाओं पर धूल अभी तक छाई है
रेशमी देख पर जिन अबलाओं की अब तक
रेशम क्या? साड़ी  सही नहीं चढ़ पाई है

पर तुम नगरों के लाल, अमीरी के पुतले
क्यों व्यथा भाग्यहीनों की मन में लाओगे
जलता हो सारा देश, किन्तु होकर अधीर
तुम दौर दौर कर क्यों ये आग बुझाओगे?

Sunday, January 2, 2011

Apt for today's situation

Just remembered a long forgotten poem by Dushyant Kumar.


हो गयी है पीर, पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए

 आज ये दीवार, पर्दों की तरह हिलने लगी
शर्त लेकिन थी की, की ये बुनियाद हिलनी चाहिए

हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद  नहीं
मेरी कोशिश है की ये सूरत बदलनी चाहिए

मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में ही सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए