Wednesday, January 12, 2011

A reminder for us, towards our duties

A famous poem by rashtra kavi Ramdhari Singh Dinkar reminding us of our duties towards society.

 क्यों ये आग बुझाओगे?
रेशमी कलम से भाग्यलेख लिखने वालों
तुम भी कभी अभावग्रस्त हो रोये हो ?
बीमार किसी बच्चे की दवा जुटाने को
तुम भी क्या घर पर पेट बाँध कर सोये हो ?

असहाय किसानों की किस्मत को खेतों में
अनायास जल में बह जाते देखा है ?
क्या खायेंगे? ये सोच निराशा से पागल
बेचारों को चीख रह जाते देखा है?

देखा है ग्रामों की अनेक रम्भाओं को
जिनकी अभाओं पर धूल अभी तक छाई है
रेशमी देख पर जिन अबलाओं की अब तक
रेशम क्या? साड़ी  सही नहीं चढ़ पाई है

पर तुम नगरों के लाल, अमीरी के पुतले
क्यों व्यथा भाग्यहीनों की मन में लाओगे
जलता हो सारा देश, किन्तु होकर अधीर
तुम दौर दौर कर क्यों ये आग बुझाओगे?

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