A famous poem by rashtra kavi Ramdhari Singh Dinkar reminding us of our duties towards society.
क्यों ये आग बुझाओगे?
रेशमी कलम से भाग्यलेख लिखने वालों
तुम भी कभी अभावग्रस्त हो रोये हो ?
बीमार किसी बच्चे की दवा जुटाने को
तुम भी क्या घर पर पेट बाँध कर सोये हो ?
असहाय किसानों की किस्मत को खेतों में
अनायास जल में बह जाते देखा है ?
क्या खायेंगे? ये सोच निराशा से पागल
बेचारों को चीख रह जाते देखा है?
देखा है ग्रामों की अनेक रम्भाओं को
जिनकी अभाओं पर धूल अभी तक छाई है
रेशमी देख पर जिन अबलाओं की अब तक
रेशम क्या? साड़ी सही नहीं चढ़ पाई है
पर तुम नगरों के लाल, अमीरी के पुतले
क्यों व्यथा भाग्यहीनों की मन में लाओगे
जलता हो सारा देश, किन्तु होकर अधीर
तुम दौर दौर कर क्यों ये आग बुझाओगे?
Wednesday, January 12, 2011
Sunday, January 2, 2011
Apt for today's situation
Just remembered a long forgotten poem by Dushyant Kumar.
हो गयी है पीर, पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
आज ये दीवार, पर्दों की तरह हिलने लगी
शर्त लेकिन थी की, की ये बुनियाद हिलनी चाहिए
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है की ये सूरत बदलनी चाहिए
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में ही सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए
हो गयी है पीर, पर्वत सी पिघलनी चाहिए
इस हिमालय से कोई गंगा निकलनी चाहिए
आज ये दीवार, पर्दों की तरह हिलने लगी
शर्त लेकिन थी की, की ये बुनियाद हिलनी चाहिए
हर सड़क पर, हर गली में, हर नगर, हर गाँव में,
हाथ लहराते हुए हर लाश चलनी चाहिए
सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं
मेरी कोशिश है की ये सूरत बदलनी चाहिए
मेरे सीने में नहीं तो तेरे सीने में ही सही,
हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए
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